Thursday, 10 January 2008

मै और मेरी घटनायें

बात पुरानी है किन्तु सत्य, मुझे तारिख ठीक से याद नहीं पर सन् था 1985, मेरे स्कुल के मित्र बेनलाल साहु के बहन की शादी थी, मै और मेरे दो मित्र हम तीनो ने शादी मे जाने की योज़ना बनाई थी वैसे भी बेनलाल का बहुत जोर का आग्रह भी था इसलिए जाना पक्का हो गया। मेरे पास एक स्कुटर थी लेंब्रेटा,मै उसे लेकर कचान्दुर लगभग दो बजे पहुच गया, क्योंकि मेरे दोनो मित्र कचान्दुर मे ही आई.टी.आई. कर रहे थे,वहाँ से हमे चारभाठा के लिए रवाना होना था। मै, पदमाकर और चन्द्र शेखर तीनो एक ही स्कुटर पर चल पड़े, ड्रायविंग मेरे जिम्मे मे थी और पहुँचने की जल्दी भी थी सड़क खराब होने के बावजुद गाड़ी 70-80 की गति से मस्ती मे चल रही थी, अचानक एक मोड़ पर पिछले चक्के ने जबाब दे दिया गति ज्यादा होने से गाड़ी खेत मे कुद पड़ी,और हम तीनो अलग-अलग दिशाँओं मे जा गिरे,अक्सर गर्मी के मौसम मे गाँव के रास्ते सुनसान हुआ करते हैं,आसपास कोई नहीं था, हिम्मत कर के हम तीनो उठे ज्यादा चोट नही आई पर गाड़ी की हालत खराब थी,तीनो मिलकर गाड़ी रोड पर लाये अपना हुलिया ठीक किया और गाड़ी ढकेल कर कुछ दुर लाये पास के खलिहान से पैरा ईकट्ठा किया गाड़ी मे स्टेपनी नहीं थी पर टूल बाक्स मौजुद था,चक्का खोला गया डिस्क से टायर को हटा उस पर पैरा लपेटा और पैरा की ही रस्सी बना अच्छी तरह बाँध दिया, गाड़ी को फिर से चलने के लायक बना हम फिर से चल पड़े अपने सफर पर, चार किलोमिटर चलने के बाद ही रिपेरिंग की दुकान मिली, हमने गाड़ी बनने के लिए दी और पास के तालाब पर चले गये अपना हुलिया ठीक करने, गाड़ी ठीक होने के बाद जैसे-तैसे हम चारभाठा रात 8 बजे तक पहुच ही गये, चुकि हमारी हालत खराब थी और उत्साह चुर-चुर हो चुका था । शादी की रश्म पुरी होते हमने अपना दर्द छिपा समस्त औपचारिकताएँ पुरी की और रात के 1 बजे वपसी हेतू जबरदस्ती इजाजत ले ली, क्योंकि हम जानते थे कि सुबह हमे कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ सकता था रात मे लोगों की व्यसतथा और अँधेरे का लाभ उठा हम निकल जाना चाहते थे, सो हम निकल पड़े, गनिमत थी की गाड़ी की हेडलाईट का शीशा ही टुटा था बल्ब जल रहा था, अँधियारी रात थी सिर्फ रास्ते के दोनो ओर जुगनु ही चमकते दिखाई दे रहे थे, हमने गाँव छोड़ा और जंगली रास्ते पर लगभग 2 किलोमिटर ही चले होगें,अचानक मुझे काफी जोर का ब्रेक लगाना पड़ा, क्योंकि सड़क के बीचों बीच एक तीन-चार साल की लड़की लाल फ्राक पहने खड़ी थी,हम फिर से गिरते-गिरते बचे, लड़की को हम तीनो ने देखा, गाड़ी के रूकते ही वह सड़क छोड़ जंगल की ओर भाग निकली, मैने हेड लाईट उसकी ओर घुमा दिया कुछ दुर के बाद वह नजरों से ओझल हो गई, मैने हेड लाईट चारो दिशाओं मे घुमा कर देखा वहाँ आसपास जंगल के अलावा घर,झोपड़ी,खेत,खलिहान होने का कोई निशान नहीं था,इतने मे पिछे बैठे चन्द्र शेखर ने मुझे आगे बढ़ने को कहा,मै फिर चल पड़ा आधा किलोमिटर चलने के पस्चात हमें सड़क के किनारे एक टुटी हुई बैलगाड़ी और निचे पड़ा एक कँकाल मानव कँकाल से मिलता जुलता दिखाई दिया,पर हम वहाँ रूके नहीं,सीधे कचान्दुर पहुँच कर ही गाड़ी रोकी,फिर रात भर हम सो न सके अपनी चोटों से ज्यादा हम अचानक घटी इन घटनाओं पर चर्चा करते रहे। और आज तक उस घटना के किसी निश्कर्श तक नहीं पहुँच पये।

Wednesday, 9 January 2008

प्यार होता नहीं है कम

जो ज़ख्म दिये है आपने भुलें नहीं हैं हम,
क्यों प्यार फिर भी आपसे होता नहीं है कम।

"साहेब" को भुलने की "साहब" ने जो कोशिस की,
ऱहमतों की बाऱिश न हुई डूबा नहीं ये गम।

आस्तिनों के साँपों को दुध से नहलाया मैने,
काटते जो थे पलट पलट कर लेते नहीं थे दम।

आँखें खुली थी जब तलक़ बहुत देर हो चुकी,
जुल्मो सितम के साये से लिपटे हुये थे हम।

ऐ बेवफ़ा, बेवफ़ाई कब तक जलायेगी हमें,
पलटेगी जब हवा ख़ाक हो ज़ायेगा सारा वहम।

एहस़ान फ़रामोशी देखी नहीं अब तक ऐसी,
य़ाद आई है जब भी "साहब" आँखें हुई हैं नम।

तूझे क्या कहुँ, तुने लाख की है बेवफ़ाई,
ऐ वफ़ा, तुँ हो बावफ़ा ख़त्म कर जुल्मों सितम।

तुझे भुलने की ईक लाख़ कोशिस कर चुका,
पर भुलाये नहीं भूल पाया एहसासे गम।

रूख़सतें रूक, हम भी चलते हैं धीरे धीरे,
राहें कहीं तो ख़त्म होगी तब आयेगा दम मे दम।

Saturday, 15 September 2007

28000 डालर का की बोर्ड

आज जब सुबह अपना मेल देख रहा था तो दोखा कि सी नेट वालों का आया हुआ है,28000 डालर का की बोर्ड, यह देख कर ईच्छा जागी कि इतना महंगा की बोर्ड,आखिर इसमे है क्या- सीनेट लिंक पर जा कर देखा,यदि आपको भी देखना हो तो लिंक दे रहा हु यहाँ चटकाईए और देख आइए।
चटकायें

Friday, 14 September 2007

नसीब अपना-अपना

न मंज़िल का पता बाकी रहा,
न कांरवाँ ही ख़ाकी रहा,
मै ढुंढता हुँ यहाँ वहाँ,
न मंज़िल मिली,न कारवाँ ।

रह गुज़र जितने मिले,
उम्मीद से ज्यादा फितने मिले,
मैने ढुंढा तो ईक पता मिला,
फिर पता दर पता मिला ।

मैने देखा तो वो ईक कीताब था,
मेरी आरज़ुओँ का हिसाब था,
हर गुन को देखा बार-बार,
हर श़य को देखा चार बार ।

हिसाब कुछ अज़ीब था,
"साहब" का वो नसीब था ।

sahebali

Wednesday, 12 September 2007

संस्कार

NARAD:Hindi Blog Aggregator
कभी पोरबंदर एक अलग राज्य था। इसके दीवान थे ओता गाँधी। वह मोहनदास करमचंद गांधी के दादाश्री थे। ओता जी अपनी इमानदारी,दायाभाव के कारण गरीबो के अभिन्न मित्र माने जाते थे। जब उनकी बेटी की शादी हुई, उनके घर उपहारो का अंबार लग गया। कुछ उनकी पदवी के कारण तो कुछ अपने सदब्योहार के कारण। बिवाह कार्य समपन्न हो गया। ठीक ठाक।
ओताजी ने इन ढेरों उपहारो को कई घोड़ों पर लदवाया। इसे राजा तक पहुचाकर कहा इन पर मेरा कोई हक नही। ये आप की प्रजा ने दिये हैं, यदि मै दिवान ना होता तो इतने उपहार न मिलते। मै इन्ही सरकारी खजाने मे जमा करवा रहा हुँ।
राजा पोरबंदर ने अपने दीवान के इस कदम पर प्रसंन्न होकर उनके द्वारा शादी पर किए गये सारे खर्च की भरपाई खजाने से कराने के आदेश दिए यह परतोषिक था इमानदारी का इतनी बडी रकम को राजा से हासिल न करना राजा का अपमान होता है उसके आदेशों की अवहेलना होती है, अतःओता गांधी ने राज्य कोष से आई रकम रख ली। इसे सहर्ष स्वीकार करने के बाद, राजा का पहले धन्यबाद किया। फिर सारी रकम को सधन्यनाद लौटा कर, अपनी प्रसंशा मे बृद्धि कर ली।
ओता गाधी बोले-राजन शुक्रिया, मगर मुझे इस रकम की जरुरत नही इसकी जरुरत गरीबों, बीमारो, अनाथों तथा असहायो को है। कृपया इसे ऐसे ही लोगो मे बटवा दे। मै आपका आभारी रहुँगा। इतना सुनते ही स्यंव राजा की आँखे खुशी से डबडबाने लगे। एसे ही थे ओता गांधी। रास्ट्रपिता महात्मा गांधी। के दादा। शायद इन्ही वंशानुगत संस्कारो का सुपरिणाम था कि आगे चलकर इसी परिवार मे करमचंद मोहन दास गाँधी यानी रास्ट्रपिता गाँधी ने विश्वभर मे अपने नाम का डंका बजवा लिया।

Tuesday, 11 September 2007

11 सितंबर


11 सितंबर,बरबस ही ध्यान अमेरिका की ओर जाता है। पर भारत में 11 सितबंर का महत्व कुछ अलग है, जानने वाले जानते होंगें, न जानने वाले जान लें,-
11 सितंबर 1839 को संयुक्त राज्य अमेरीका के शिकागो नगर में संपन्न विश्व धर्म संसद की सभा में स्वामी विवेकानंद का भाषण है जिसने तहलका मचा दिया था। अपने भाषण मे उन्होने कहा था कि सभी धर्मो और पंथों के अनुयायी अपने अपने मार्ग पर चलते हुए एक ही ईश्वर के पास पहुँचते हैं।
11 सितंबर 1906 के दिन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग स्थित ट्राँसवाल मे आयोजित भारतीयों की एक सभा में एशियाई रजिस्ट्रेशन अधिनियम के विरुद्ध शपथ ली गई,कि इस कानुन को वे नहीं मानेगें चाहे जितना कष्ट सहना पड़े। महात्मा गाँधी की पुरी सहानुभुती निर्धन,दलित और पीड़ितों के साथ थी। गाँधी जी ने सर्वधर्म समभाव पर बहुत बल दिया था,उनका कहना था सब धर्म ईश्वर के दिये हुये हैं धर्म मनुष्य की पहुच से परे है, सब अपनी अपनी दृष्टि के मुताबीक चलते हैं तब तक सच्चे हैं।
11 सितंबर 1895 विनोबा जी का जन्म दिवस, विनोबा जी ने लोगों को दुसरे धर्म के बारे मे सही जानकारी हो और उनकी भ्रांतियाँ दुर हो , उन्होने न्यू टेस्टामेंट,कुरानशरीफ,जपुजी व धमम्पद जैसी पुस्तकों का सार नीकाला और प्रकाशित किया। उन्होने भूदान-ग्रामदान आंदोलन मे अपनी पूरी शक्ती लगाई वह मानव इतिहास में अद्वितीय हैं।

Sunday, 9 September 2007

स्वामी विवेकानंद का एक कथन


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
राष्ट्र की उँचाई नागरिको के मनोबल की ऊंचाई के सहारे आंके जाती है। स्वामी विबेकानंद एक अनन्य राष्ट्र भक्त थे। उन्होने विश्व के अनेक देशों मे भ्रमण करके भारत वर्ष के महत्व को दर्शाया था। आज भी उन्हे पूरा विश्व स्मरण करता है। वह जानते थे कि अध्यात्म और भगवद् भजन धार्मिक प्रवृत्ति के लिए आवश्यक है किंतु देश कि स्वतंत्रता के लिए स्वस्थ शरिरयुक्त पुरूषों का होना भी उतना ही आवश्यक है। उनका मनतब्य यह भी रहा है कि गीता पाठ की अपेक्षा ब्यायाम करने मे तुम स्वर्ग के अधिक समीप पहुच सकोगे। स्पष्टपतःगीता पाठ के माध्यम से इश्वर मे लीन होना ही तो है किन्तु शरीर स्वस्थ होगा तो अनेक महत्वपुर्ण काम भी किये जा सकते है, जिनसे राष्ट्र और समाज का हित हो यही कर्म आनंद उपलब्ध कराता है परतंत्र भारत मे दबे हुए ब्यक्ति अंग्रेज सरकार के प्रति कर्तब्निष्ठ रहते थे, कि गुलामी को कर्तब्य समझ लेना कितना आसान है, जब कि कर्तब्यनिष्ठ उन लोगो से बहुत दूर थी देशवासियोँ को उन्होने यही पाठ पढाया कि जिसे अपने आप मे विश्वास नही है, उसे भगवान मे भी विश्वास नही हो सकता। वास्तविकता यही थी कि गुलामी से मुक्ति होने के लिए प्रत्येक मनुष्य को स्वावलंबी और आत्मविश्वासी होना आवश्यक था। स्वामी जी द्वारा आत्मविश्वास का जो अलख जन जन के मन मस्तिक मे उस समय जगाया गया वह आज भी अपरिवर्तित ही है। आज जब भारतवासी स्वतंत्र हैं, इस राष्ट्र मे उपल्बध ब्याधियो से छुटकारा पाने के लिए यदि आत्मविश्वास का सम्बल मनुष्य मात्र के साथ हो अथवा रहे शरीर स्वस्थ हो और सवतंत्र रहने की इच्छा हो तो देश की प्रगति को कोइ नहीं रोक पायेगा। आत्म विवेचना के संदर्भ मे स्वामी जी का कथन था कि स्वयं का इच्छा या बुरापन दुसरे की दृष्टि से मत नापो, ऐसा करना अपने मन कि दुर्बलता दिखाना है। मनुष्य कैसा है , यह आकलन वह स्वयं करे तो सही होगा।।।।।